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प्रारंभिक पहचान सकारात्मक नैदानिक परिणामों के साथ ल्यूकेमिया के इलाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए, कोई भी लक्षण जो दो सप्ताह से अधिक समय तक रहता है तो उसको नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
ल्यूकेमिया एक हेमॅटोलॉजिकल कैंसर (रक्त कैंसर का प्रकार) है जो आमतौर पर बोन मैरो (अस्थि मज्जा) में शुरू होता है। अविकसित सफेद रक्त सेल्स (कोशिकाओं) में असामान्य वृद्धि को 'ब्लास्ट' या 'ल्यूकेमिया सेल्स (कोशिकाएं)' कहा जाता है, जिसके परिणामस्वरूप ल्यूकेमिया होता है। थोड़ी देर के बाद, सामान्य रक्त सेल्स (कोशिकाएं) मर जाती हैं और बोन मैरो (अस्थि मज्जा) में निर्मित इन असामान्य सेल्स (कोशिकाओं) द्वारा प्रतिस्थापित की जाती हैं असामान्य सेल्स मरती नहीं हैं और अनियंत्रित रूप से विभाजित होती हैं।
बाद के चरणों में, ये ल्यूकेमिक सेल्स (कोशिकाएं) विभिन्न अंगों जैसे बोन मैरो (अस्थि मज्जा), स्प्लीन (प्लीहा) और अन्य अंगों में जमा हो जाती हैं और उनके कामकाज को प्रभावित करती हैं।
उनके बढ़ने के दर के आधार पर, ल्यूकेमिया को अक्यूट (तेजी से बढ़ने वाला ल्यूकेमिया और क्रोनिक - दीर्घकालिक (धीमी गति से बढ़ने वाला) ल्यूकेमिया इन दो प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है।
क्रोनिक (दीर्घकालिक) ल्यूकेमिया के मामले में, रोग के लक्षण उन्नत चरणों में दिखाई देने लगते हैं और इसलिए, अक्यूट ल्यूकेमिया की तुलना में इस प्रकार के ल्यूकेमिया का इलाज करना अधिक चुनौतीपूर्ण होता है।
अक्यूट लिम्फोसाइटिक ल्यूकेमिया तब होता है जब बोन मैरो (अस्थि मज्जा) में मौजूद रक्त-उत्पादक सेल्स (कोशिकाओं) में म्यूटेशन (उत्परिवर्तन) होता है। इसके कारण अपरिपक्व सफेद रक्त सेल्स (कोशिकाओं) का अति उत्पादन हो जाता है, जिसे ल्यूकेमिक ब्लास्ट या लिम्फोब्लास्ट कहा जाता है। चूंकि यह स्थिति बोन मैरो (अस्थि मज्जा) की सामान्य सफेद रक्त सेल्स (कोशिकाओं) और लाल रक्त सेल्स (कोशिकाओं) का उत्पादन करने की क्षमता को प्रभावित करती है, इसलिए एएलएल के सभी मरीज़ों में एनीमिया और बार-बार होने वाले संक्रमण अधिक आम हो जाते हैं। अक्यूट लिम्फोसाइटिक ल्यूकेमिया (एएलएल) जो विशेष रूप से टी-लिम्फोसाइट्स से उत्पन्न होता है, इसलिए इसे टी-सेल अक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया (टी- एएलएल) कहा जाता है।
बोन मैरो (अस्थि मज्जा) में मौजूद माइलॉयड सेल्स (कोशिकाओं) से एएमएल उत्पन्न होता है। माइलॉयड सेल्स (कोशिकाएं) उन सेल्स (कोशिकाओं) को संदर्भित करती हैं जो लाल रक्त कोशिकाओं, सफेद रक्त सेल्स (कोशिकाओं) (लिम्फोसाइट्स को छोड़कर) और प्लेटलेट्स को पैदा कर सकती हैं। चूंकि यह स्थिति लाल रक्त सेल्स (कोशिकाओं) और प्लेटलेट्स के उत्पादन को प्रभावित करती है, एएमएल से एनीमिया, आसानी से रक्तस्राव होना और चोट लगना यह हो सकता है।
जब बोन मैरो (अस्थि मज्जा) में सफेद रक्त सेल्स (कोशिकाओं) (जिन्हें लिम्फोसाइट्स कहा जाता है) का उत्पादन प्रभावित होता है तब क्रोनिक (दीर्घकालिक) लिम्फोसाइटिक ल्यूकेमिया होता है, और इस प्रकार का कैंसर धीरे-धीरे बढ़ता है। इस प्रकार का कैंसर वृद्ध वयस्कों में अधिक आम है।
यह ग्रैनुलोसाइटिक ल्यूकेमिया के रूप में भी जाना जाता है, यह एक प्रकार का कैंसर है जिसमें माइलॉयड सेल्स (कोशिकाएं) असामान्य रूप से बढ़ने लगती हैं।
यह एक धीमी गति से बढ़ने वाला कैंसर का प्रकार है जो बोन मैरो (अस्थि मज्जा) से विकसित होता है और बी-सेल्स (कोशिकाओं) (बी-लिम्फोसाइट्स) का असामान्य रूप से उच्च संख्या में उत्पादन करने का कारण बनता है, यह सेल्स विभिन्न संक्रमणों से लड़ने के लिए जिम्मेदार होती हैं। साथ ही यह दुर्लभ प्रकार के कैंसर में से एक है।
ल्यूकेमिया के लक्षण अक्सर अस्पष्ट होते हैं और अक्सर अन्य कम गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के समान होते हैं, और इसके कारण इस प्रकार के लक्षणों को अक्सर अनदेखा किया जाता है। इस वजह से रोग के निदान में देरी होती है, जिसके परिणामस्वरुप खराब नैदानिक परिणाम सामने आते है।
हालाँकि, जैसा कि पहले चर्चा की गई है, क्रोनिक (दीर्घकालिक) ल्यूकेमिया प्रारंभिक अवस्था में कोई लक्षण नहीं दिखा सकता है; हालाँकि, रोग उन्नत चरणों में बढ़ने पर लक्षण स्पष्ट हो जाते हैं।
शोधकर्ताओं ने कुछ कारकों की पहचान की है जो ल्यूकेमिया के जोखिम को बढ़ाते हैं :
क्रोनिक (दीर्घकालिक) ल्यूकेमिया बुजुर्गों में अधिक आम है; दूसरी ओर अक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया बच्चों में अधिक आम है।
अक्यूट माइलॉयड ल्यूकेमिया (एएमएल) की घटनाएं धूम्रपान करने वालों में अधिक पाई जाती हैं।
रेडिएशन (विकिरण) के संपर्क से व्यक्ति के अक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया (एएलएल), अक्यूट माइलॉयड ल्यूकेमिया (एएमएल) और क्रोनिक (दीर्घकालिक) माइलॉयड ल्यूकेमिया (सीएमएल) के विकास का जोखिम बढ़ सकता है। जिन लोगों ने अन्य कैंसर के उपचार के लिए रेडिएशन थेरेपी (विकिरण चिकित्सा) प्राप्त की है, उनमें ल्यूकेमिया विकसित होने का जोखिम अधिक होता है।
कीटनाशकों और औद्योगिक द्रावकों जैसे कुछ रसायनों के संपर्क में आने से ल्यूकेमिया का खतरा बढ़ सकता है।
कुछ कीमो दवाएं कुछ सालों बाद अक्यूट ल्यूकेमिया के विकास के जोखिम को बढ़ा सकती हैं।
जिन लोगों को कुछ जन्मजात रोग होते हैं उनमें एएलएल और एएमएल विकसित होने का जोखिम अधिक होता है। उदाहरण के लिए, जिन लोगों को डाउन सिंड्रोम, ब्लूम सिंड्रोम और एटैक्सिया - टेलैंगिएक्टेसिया का निदान हुआ हो उन लोगों में अक्यूट ल्यूकेमिया के निदान का जोखिम बढ़ जाता है। कुछ रक्त विकार भी पाए गए है जो लोगों में एएमएल के विकास के जोखिम को बढ़ाने हैं।
एचटीएलवी - 1 (ह्यूमन टी-लिम्फोट्रोपिक वायरस) संक्रमण से टी-सेल ल्यूकेमिया का खतरा बढ़ जाता है।
ल्यूकीमिया के पारिवारिक इतिहास वाले लोगों में इस रोग के विकसित होने का जोखिम अधिक होता है।
अध्ययनों से पता चला है कि ल्यूकेमिया महिलाओं की तुलना में पुरुषों में अधिक आम है।
यदि किसी व्यक्ति को ल्यूकेमिया होने का संदेह है, तो डॉक्टर द्वारा निम्नलिखित परीक्षणों की सिफारिश की जाती है :
यदि कोई व्यक्ति ल्यूकेमिया के लक्षणों का अनुभव कर रहा है, तो डॉक्टर लक्षणों के पीछे के कारण को समझने के लिए मेडिकल हिस्ट्री (चिकित्सा इतिहास) का आकलन करता है। वह किसी भी सूजी हुई लिम्फ नोड्स, एनीमिया के कारण पीली त्वचा आदि की जांच के लिए शारीरिक परीक्षण भी कर सकता है।
यदि ल्यूकेमिया का संदेह होता है, तो डॉक्टर सबसे पहले रक्त परीक्षण की सलाह देते हैं। यदि रक्त परीक्षण में असामान्य सफेद रक्त कोशिकाओं की अधिक संख्या और सामान्य सफेद रक्त कोशिकाओं, लाल रक्त सेल्स (कोशिकाओं) या प्लेटलेट्स की कम संख्या का पता चलता है, तो ल्यूकेमिया का संदेह होता है।
असामान्य गुणसूत्रों की उपस्थिति ल्यूकेमिया का संकेत है। एक सटीक निदान प्राप्त करने के लिए, डॉक्टर साइटोजेनेटिक अनैलिसिस (विश्लेषण) की सिफारिश कर सकते हैं, जिसमें रक्त, बोन मैरो (अस्थि मज्जा) या लिम्फ नोड्स के नमूनों में मौजूद सेल्स (कोशिकाओं) को लिया जाता है और क्षतिग्रस्त, लुप्त हुए, विकृत या अतिरिक्त गुणसूत्रों सहित गुणसूत्रों में असामान्यताओं की जांच की जाती है।
बोन मैरो (अस्थि मज्जा) बायोप्सी के दौरान, बोन मैरो (अस्थि मज्जा) से थोड़ी मात्रा में तरल पदार्थ निकालने के लिए एक सुई का उपयोग किया जाएगा। डॉक्टर बोन मैरो (अस्थि मज्जा) का एक छोटा भाग निकालने पर भी विचार कर सकते हैं। बाद में इन नमूनों की माइक्रोस्कोप के तहत जांच की जाती है। उनका जीन परिवर्तनों के लिए भी परीक्षण किया जाएगा जो रोग की पहचान करने और उस पर नज़र रखने में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
यदि लिम्फ नोड्स बढ़े हुए पाए जाते हैं, तो डॉक्टर लिम्फ नोड बायोप्सी की सिफारिश कर सकते हैं। यह परीक्षण डॉक्टर को यह निर्धारित करने में सहायता करेगा कि मरीज़ को ल्यूकेमिया है या नहीं। इस प्रक्रिया में संबंधित लिम्फ नोड से ऊतक निकालना और माइक्रोस्कोप के तहत इसकी जांच करना शामिल है।
लम्बर पंचर या स्पाइनल टैप एक चिकित्सा प्रक्रिया है जिसमें सेरब्रोस्पाइनल फ्लूइड (मस्तिष्कमेरु द्रव) को निकाला जाता है और ल्यूकेमिया मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी में फैल गया है या नहीं यह पता लगाने के ली इसकी जांच की जाती है कि । रीढ़ के आस पास के तरल पदार्थ को इकट्ठा करने के लिए पीठ के निचले हिस्से में हड्डियों के बीच की जगह में एक महीन सुई डाली जाएगी। ल्यूकेमिया सेल्स (कोशिकाओं) की उपस्थिति के लिए इस नमूने की माइक्रोस्कोप के तहत जांच की जाएगी।
कभी-कभी, छाती के क्षेत्र में लिम्फ नोड्स में सूजन की जांच करने के लिए डॉक्टर एक्स-रे स्कैन की भी सिफारिश कर सकते हैं।
रोग अन्य अंगों में फैल गया है या नहीं इसकी जांच करने के लिए एमआरआई स्कैन, पेट सीटी स्कैन या अल्ट्रासाउंड स्कैन जैसे इमेजिंग टेस्ट की सिफारिश की जा सकती है।
एक निश्चित निदान प्राप्त करने पर, हेमॅटो-ऑन्कोलॉजिस्ट व्यक्तिगत उपचार योजना तैयार करने से पहले मरीज़ की कुल स्वास्थ्य स्थिति और रोग का चरण, मरीज़ की उम्र और उसकी समग्र स्थिति जैसे कुछ अन्य कारकों का सावधानीपूर्वक आकलन करते हैं।
ल्यूकेमिया के लिए कीमोथेरेपी सबसे अधिक सिफारिश किया जाने वाला उपचार विकल्प है। एक सिस्टमिक थेरेपी (प्रणालीगत चिकित्सा) के रूप में, कीमोथेरेपी पूरे शरीर में मौजूद ल्यूकेमिया सेल्स (कोशिकाओं) को नष्ट कर देती है। कीमोथेरेपी ल्यूकेमिया सेल्स (कोशिकाओं) को मारने के लिए अत्यधिक शक्तिशाली कैंसर विरोधी दवाओं का उपयोग करती है। ज्यादातर मामलों में, बेहतर उपचार प्रतिक्रिया के लिए एक से अधिक कीमो दवा का उपयोग किया जाता है।आम तौर पर, उपचार के दिनों की निर्दिष्ट संख्या के साथ कीमोथेरेपी को साईकल्स में दिया जा सकता है, जिसके बाद आराम के दिन होते हैं - यह शरीर के स्वस्थ होने और उपचार के लिए अच्छी प्रतिक्रिया देने के लिए महत्वपूर्ण होता है। रोग की गंभीरता और मरीज़ की कुल स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर उपचार की अवधि हर मरीज़ में अलग अलग होती है।
रेडिएशन थेरेपी (विकिरण चिकित्सा) ल्यूकेमिया सेल्स (कोशिकाओं) को बढ़ने और विभाजित होने से रोकने या मारने के लिए हाई एनर्जी रेडिएशन बीम (उच्च-ऊर्जा विकिरण बीम) का उपयोग करती है, जो एक्स-रे या प्रोटॉन बीम हो सकता है। रेडिएशन (विकिरण) बीम को शरीर में उन विशिष्ट स्थानों पर पहुँचाया जा सकता है जहाँ कैंसर सेल्स (कोशिकाएं) जमा हो गई हैं (जैसे स्प्लीन - प्लीहा, लिम्फ नोड्स, आदि), या यह स्टेम सेल प्रत्यारोपण से पहले पूरे शरीर को दिया जाने वाला उपचार हो सकता है।
जब ल्यूकेमिया के इलाज के लिए कीमोथेरेपी या रेडिएशन थेरेपी (विकिरण चिकित्सा) दी जाती है, तब बोन मैरो (अस्थि मज्जा) सेल्स (कोशिकाएं), जो विभिन्न रक्त सेल्स (कोशिकाओं ) के उत्पादन के लिए जिम्मेदार होती हैं, क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। क्षतिग्रस्त बोन मैरो (अस्थि मज्जा) सेल्स (कोशिकाओं) को बहाल करने के लिए, स्टेम सेल प्रत्यारोपण की सिफारिश की जाती है। स्टेम सेल ट्रांसप्लांटेशन (स्टेम सेल प्रत्यारोपण) या बोन मैरो ट्रांसप्लांटेशन (अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण) ल्यूकेमिया के लिए उपलब्ध प्रमुख उपचार विकल्पों में से एक है। उच्च खुराक कीमोथेरेपी और / या रेडियोथेरेपी के साथ जिन असामान्य या कैंसर सेल्स (कोशिकाओं) का इलाज किया गया है, यह प्रक्रिया उनको नए, स्वस्थ-कार्यशील स्टेम सेल के साथ बदल देती है । इन स्वस्थ सेल्स (कोशिकाओं) को मरीज़ से (उसकी कीमोथेरेपी या रेडियोथेरेपी से ठीक पहले) या दाता के बोन मैरो (अस्थि मज्जा) या रक्त से लिया जा सकता है, और मरीज़ को चढ़ाया जा सकता है। ये स्वस्थ स्टेम सेल्स (कोशिकाएं) बाद में बढ़ती है और विभिन्न प्रकार की रक्त सेल्स (कोशिकाओं), अर्थात् सफेद रक्त सेल्स (कोशिकाओं), लाल रक्त सेल्स (कोशिकाओं) और प्लेटलेट्स में विकसित होती है।
यह उपचार ल्यूकेमिया सेल्स (कोशिकाओं) पर देखी जाने वाली कुछ विशेषताओं पर केंद्रित है। टार्गेटेड थेरेपी (लक्षित चिकित्सा) ल्यूकेमिया सेल्स (कोशिकाओं) को बढ़ने और विभाजित होने से रोककर, सेल्स (कोशिकाओं) को जीवित रहने के लिए आवश्यक रक्त आपूर्ति को काटकर काम करती हैं, या सेल्स (कोशिकाओं) को सीधे मार देती हैं। टार्गेटेड थेरेपी (लक्षित चिकित्सा) केवल कैंसर सेल्स (कोशिकाओं) को मारती है जबकि स्वस्थ, सामान्य सेल्स (कोशिकाओं) को नुकसान नहीं पहुंचाती है।
इम्यूनोथेरेपी को बायोलॉजिकल थेरेपी (जैविक चिकित्सा) के रूप में भी जाना जाता है, इम्यूनोथेरेपी ल्यूकेमिया सेल्स (कोशिकाओं) पर हमला करने के लिए शरीर की प्राकृतिक रक्षा प्रणाली को उत्तेजित करने के लिए विशिष्ट दवाओं का उपयोग करती है। इम्यूनोथेरेपी में इंटरफेरॉन, इंटरल्यूकिन और सीएआर-टी सेल थेरेपी शामिल हो सकती है।
हाँ, ल्यूकेमिया का इलाज संभव हैं। आज, हमारे पास उपचार के कई विकल्प उपलब्ध हैं जो न केवल मरीज़ों के जीवित रहने की संभावना को बढ़ाते हैं बल्कि मरीज़ों के जीवन की गुणवत्ता पर भी सकारात्मक प्रभाव डालते हैं।
प्रारंभिक पहचान सकारात्मक नैदानिक परिणामों के साथ ल्यूकेमिया के इलाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए, यदि कोई व्यक्ति ऐसे लक्षणों का अनुभव कर रहा है जो खतरनाक हैं और दो सप्ताह से अधिक समय तक रहते हैं, तो उसे आगे की जांच के लिए तुरंत डॉक्टर से परामर्श करना चाहिए।
हाँ, ल्यूकेमिया, विशेष रूप से अक्यूट ल्यूकेमिया, वयस्कों की तुलना में बच्चों में अधिक पाया जाता है। सामान्य कारणों में कुछ अनुवंशिक सिंड्रोम जो प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रभावित करते हैं, कुछ आनुवंशिक विकार और रेडिएशन (विकिरण) के उच्च स्तर के संपर्क में आना आदि शामिल हैं ।
हां, कुछ मरीज़ों में ल्यूकेमिया का रिलैप्स (पुनरावर्तन) हो सकता है या वापस आ सकता है। इसलिए, ल्यूकेमिया मरीज़ों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे उपचार के बाद सख्ती से अपने फॉलो-अप (अनुवर्ती) नियमों का पालन करें। शेड्यूल किए गए फॉलो-अप अपॉइंटमेंट का सख्ती से पालन करने से रिलैप्स (पुनरावर्तन) को उनके शुरुआती चरणों में पकड़ने और प्रभावी ढंग से इलाज करने में मदद मिलती है।
वर्तमान में, बच्चों में ल्यूकेमिया को रोकने के लिए कोई ज्ञात उपाय नहीं हैं। हालाँकि, कुछ उपाय हैं जिन्हें आप अपने ल्यूकेमिया जोखिम को कम करने के लिए कर सकते हैं :