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रेक्टल (मलाशय) कैंसर तब विकसित होता है जब रेक्टम (मलाशय) की परत बनाने वाली सेल्स (कोशिकाएं) विभाजित होने लगती हैं और अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं। बड़ी आंत का आखरी छह इंच रेक्टम (मलाशय) बनाता है और मल को बाहर निकालने तक ले जाता है। अक्सर कोलन कैंसर और रेक्टल (मलाशय) कैंसर को समूहीकृत किया जाता है और इन्हें एक साथ कोलोरेक्टल (मलाशय) कैंसर कहा जाता है।
रेक्टल (मलाशय) कैंसर तब विकसित होता है जब रेक्टम (मलाशय) की परत बनाने वाली सेल्स (कोशिकाएं) विभाजित होने लगती हैं और अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं। बड़ी आंत का आखरी छह इंच रेक्टम (मलाशय) बनाता है और मल को बाहर निकालने तक ले जाता है। अक्सर कोलन कैंसर और रेक्टल (मलाशय) कैंसर को समूहीकृत किया जाता है और इन्हें एक साथ कोलोरेक्टल (मलाशय) कैंसर कहा जाता है।
नॉन - कैंसरस पॉलीप्स, जो सौम्य सेल्स (कोशिकाओं) के असामान्य द्रव्यमान होते हैं, वे रेक्टल (मलाशय) कैंसर के लिए सामान्य पूर्व लक्षण होते हैं। रेक्टल (मलाशय) कैंसर एक धीमी गति से बढ़ने वाली बीमारी है जो आमतौर पर रेक्टम (मलाशय) तक ही सीमित होती है। हालाँकि, अगर इसका पता नहीं चलता है और इसे अनुपचारित छोड़ दिया जाता है तो यह अन्य अंगों में फैल सकता है।
जिन सेल्स (कोशिकाओं) से वे उत्पन्न होते हैं, उनके आधार पर, रेक्टल (मलाशय) कैंसर को निम्न प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है :
एडेनोकार्सिनोमा रेक्टल (मलाशय) कैंसर का सबसे आम प्रकार है। एडेनोकार्सिनोमा रेक्टम (मलाशय) की अंदरूनी परत में पाई जाने वाली सेल्स (कोशिकाओं) से उत्पन्न होते हैं।
कार्सिनॉइड ट्यूमर कोलन (बृहदान्त्र) क्षेत्र में मौजूद हार्मोन बनाने वाली सेल्स (कोशिकाओं) में बनते हैं।
मूल रूप से, ये नरम ऊतक सार्कोमा होते हैं जो रेक्टम (मलाशय) की सेल्स (कोशिकाओं) से उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार का रेक्टल (मलाशय) कैंसर अत्यंत दुर्लभ होता है।
रेक्टम (मलाशय) का लिंफोमा एक अन्य दुर्लभ प्रकार का रेक्टल (मलाशय) कैंसर है।
रेक्टल (मलाशय) कैंसर विभिन्न लक्षणों के साथ खुद को प्रकट करता है, जिनमें से सभी लक्षणों के लिए चिकित्सकीय ध्यान देने की आवश्यकता होती है। हालांकि, इस प्रकार का कैंसर बिना किसी लक्षण के भी मौजूद हो सकता है, इसलिए नियमित स्क्रीनिंग परीक्षण करना महत्वपूर्ण हो जाता है।
रेक्टल (मलाशय) कैंसर के कुछ लक्षण निम्नलिखित हैं :
आमतौर पर रेक्टल (मलाशय) कैंसर कई वर्षों में विकसित होता है, जिसकी शुरुआत एक पॉलीप, एक असामान्य कोशिका गांठ के रूप में होती है। कुछ पॉलीप्स में कैंसर के रुप में विकसित होने और बढ़ने और रेक्टम (मलाशय) की दीवार में प्रवेश करने की क्षमता होती है। वर्षों से, शोधकर्ताओं ने रेक्टल (मलाशय) कैंसर के लिए कुछ जोखिम कारकों की पहचान की है :
रेक्टल (मलाशय) कैंसर का खतरा उम्र के साथ बढ़ता जाता है ।
जिन लोगों का कोलन कैंसर या रेक्टल (मलाशय) कैंसर का सकारात्मक पारिवारिक इतिहास होता है, उन लोगों को रेक्टल (मलाशय) कैंसर होने का खतरा अधिक होता है।
रेड मीट (लाल मांस) का अत्यधिक सेवन, उच्च वसा वाला आहार और प्रोसेस्ड मीट (प्रसंस्कृत मांस) से रेक्टल (मलाशय) कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।
जिन लोगों ने अतीत में पॉलीप्स और कोलोरेक्टल (मलाशय) कैंसर के लिए इलाज कराया है, उनमें रेक्टल (मलाशय) कैंसर विकसित होने का जोखिम अधिक होता है।
जिन लोगों को अल्सरेटिव कोलाइटिस, क्रोहन कोलाइटिस आदि जैसे आंत्र विकारों का निदान हुआ हो उन लोगों को रेक्टल (मलाशय) कैंसर होने का खतरा अधिक होता है।
धूम्रपान से रेक्टल (मलाशय) कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।
यदि ऊपर बताए गए लक्षणों में से कोई भी लक्षण कुछ दिनों से अधिक समय तक देखा जाता है, तो डॉक्टर रेक्टल (मलाशय) कैंसर के लक्षणों की जांच के लिए स्क्रीनिंग टेस्ट की सिफारिश कर सकते हैं। रेक्टल (मलाशय) कैंसर का पता लगाने के लिए निम्नलिखित जांच और नैदानिक परीक्षण उपलब्ध हैं :
फीकल ऑकल्ट ब्लड टेस्ट (एफओबीटी) कोलोरेक्टल (मलाशय) कैंसर के लिए अनुशंसित एक सामान्य स्क्रीनिंग प्रक्रिया है। यह परीक्षण मल के नमूनों में छिपे (ऑकल्ट) रक्त की तलाश करता है। मल में रक्त रेक्टम (मलाशय) में कोलन कैंसर या पॉलीप्स का संकेत हो सकता है; हालाँकि, सभी ट्यूमर या पॉलीप्स से खून नहीं निकलता है। यह परीक्षण केवल रक्त की उपस्थिति या अनुपस्थिति का पता लगा सकता है; यह रक्तस्राव का कारण नहीं बता सकता। यदि यह परीक्षण रक्तस्राव की पुष्टि करता है, तो रक्तस्राव का कारण निर्धारित करने के लिए अतिरिक्त परीक्षण किए जाने चाहिए।
यदि रेक्टल ट्यूमर का संदेह होता है, तो एक डिजिटल रेक्टल परीक्षण की सिफारिश की जा सकती है, जिसके दौरान ट्यूमर की जांच करने के लिए डॉक्टर हाथों में दस्ताने पहनकर चिकनी उंगली एनस (गुदा) के माध्यम से अंदर डालकर जांच कर सकते हैं। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि सभी रेक्टल ट्यूमर को इस तरह नहीं देखा जा सकता है और इसलिए, अतिरिक्त परीक्षणों की आवश्यकता होती हैं।
कोलोनोस्कोपी के दौरान, प्रकाश स्रोत के साथ एक लचीला एंडोस्कोप (कोलोनोस्कोप) और एक वीडियो कैमरा एनस (गुदा) के माध्यम से रेक्टम (मलाशय) में डाला जाता है। स्कैन से पहले, मरीज़ को बेहोश किया जाता है। यह स्कैन डॉक्टरों को रेक्टम (मलाशय) और कोलन (बृहदान्त्र) के पूरे क्षेत्रों में पॉलीप्स की उपस्थिति की जांच करने में मदद करता है। यदि कोई पॉलीप्स पाया जाता है, तो बायोप्सी नमूना भी इकठ्ठा किया जा सकता है और आगे के विश्लेषण के लिए भेजा जा सकता है।
अगर डॉक्टर को मेटास्टेसिस का संदेह होता है तो पेट और पेल्विस (श्रोणि) के क्षेत्रों के लिए छाती का एक्स-रे और सीटी स्कैन जैसे इमेजिंग टेस्ट की सिफारिश की जा सकती है।
सीईए ट्यूमर द्वारा निर्मित एक ट्यूमर मार्कर होता है और रक्त में इसका पता लगाया जा सकता है। सीईए का उच्च स्तर रेक्टल (मलाशय) कैंसर का संकेत दे सकता है; हालाँकि, इसे एक निर्णायक परीक्षण नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि कई अन्य स्वास्थ्य स्थितियों के कारण भी सीईए का स्तर अधिक हो सकता हैं। कभी-कभी रेक्टल (मलाशय) कैंसर के मरीज़ों द्वारा दिखाई गई उपचार की प्रतिक्रिया को मापने के लिए भी इस परीक्षण का उपयोग किया जाता है।
रेक्टल (मलाशय) कैंसर के लिए उपचार योजना कई कारकों के आधार पर तैयार की जाती है, जैसे :
रेक्टल (मलाशय) कैंसर के उपचार के लिए कई विकल्प उपलब्ध हैं और प्रमुख उपचार विकल्पों में सर्जरी, रेडिएशन थेरेपी (विकिरण चिकित्सा) और कीमोथेरेपी शामिल हैं।
ट्यूमर को निकालने और ट्यूमर के आस पास के स्वस्थ ऊतकों के एक छोटे से हिस्से को निकालने के लिए सर्जरी की जाती है। रोग के चरण के आधार पर, रेक्टल (मलाशय) कैंसर के उपचार और प्रबंधन के लिए कई सर्जिकल प्रक्रियाएं चुनी जाती हैं
पॉलीपेक्टोमी के दौरान, यदि पॉलीप कैंसरयुक्त पाया जाता है, तो इसे कोलोनोस्कोपी के माध्यम से निकाल दिया जाएगा।
यदि कैंसर रेक्टम (मलाशय) के अंदर स्थित है, स्थानीयकृत बना हुआ है और रेक्टम (मलाशय) की दीवार में आगे नहीं बढ़ा है, तो इसे आसपास के सामान्य ऊतकों की थोड़ी मात्रा के साथ निकाल दिया जाता है।
यदि कैंसर रेक्टम (मलाशय) की दीवार तक बढ़ गया है, तो रेक्टम (मलाशय) के कैंसरयुक्त ऊतकों के साथ-साथ आस-पास के स्वस्थ ऊतकों को निकाल दिया जाता है। रेक्टम (मलाशय) और पेट की दीवार के बीच के ऊतक को भी निकाला जा सकता है। रेक्टम (मलाशय) के आसपास के लिम्फ नोड्स का भी ऑपरेशन किया जा सकता है और माइक्रोस्कोप के तहत कैंसर के संकेतों के लिए उनकी जांच की जा सकती है।
यदि कैंसर पास के अंगों में मेटास्टेसाइज हो गया है, तो बड़ी आंत का निचला हिस्सा, पूरा रेक्टम (मलाशय), एनस (गुदा) और ब्लैडर (मूत्राशय) को निकाल दिया जाता है। महिलाओं में सर्विक्स (गर्भाशय ग्रीवा), योनि, ओवरीज (अंडाशय) और आसपास के लिम्फ नोड्स को निकाला जा सकता है। पुरुषों में यदि कैंसर आक्रामक है तो प्रोस्टेट (पौरुष ग्रंथि) को निकालने पर भी विचार किया जा सकता है । इन मामलों में, सर्जन पेट में एक चीरा लगाते है और बचे हुए कोलन (बृहदान्त्र) को इससे जोड़ते है (कोलोस्टोमी) । इस ओपनिंग के माध्यम से अपशिष्ट शरीर से बाहर निकल जाता है और पेट से जुड़े बैग में जमा हो जाता है।
रेक्टल (मलाशय) कैंसर के इलाज के लिए इक्स्टर्नल बीम रेडिएशन थेरेपी (बाहरी किरण विकिरण चिकित्सा) और इन्टर्नल बीम रेडिएशन थेरेपी (आंतरिक किरण विकिरण चिकित्सा) (ब्रेकीथेरेपी) दोनों का उपयोग किया जाता है। इक्स्टर्नल बीम रेडिएशन थेरेपी (बाहरी किरण विकिरण चिकित्सा) के मामले में, रेडिएशन बीम (विकिरण किरणों) को बाहरी रेडिएशन (विकिरण) स्रोत के माध्यम से वितरित किया जाता है; जबकि, ब्रैकीथेरेपी के दौरान, एक रेडिएशन (विकिरण) स्रोत को ट्यूमर के अंदर या उसके बहुत करीब रखा जाता है। इस रेडिएशन (विकिरण) स्रोत से निकलने वाला रेडिएशन (विकिरण) धीरे-धीरे कैंसर सेल्स (कोशिकाओं) को मारता है। उन्नत चरण के रेक्टल (मलाशय) कैंसर के मामलों में, दर्द और बीमारी से संबंधित अन्य लक्षणों को कम करने के लिए रेडिएशन थेरेपी (विकिरण चिकित्सा) की सिफारिश की जा सकती है।
कीमोथेरेपी रेक्टल (मलाशय) कैंसर के लिए सिफारिश किए जाने वाले मुख्य उपचार विकल्पों में से एक है। रेक्टल (मलाशय) कैंसर के मरीज़ों में, प्रक्रिया से बची हुई कैंसर सेल्स (कोशिकाओं) को खत्म करने के लिए सर्जरी के बाद कीमोथेरेपी की सिफारिश की जा सकती है । सर्जरी से पहले, कीमोथेरेपी और रेडिएशन थेरेपी (विकिरण चिकित्सा) के संयोजन की सिफारिश की जा सकती है ताकि आकार में बड़े ट्यूमर को छोटा किया जा सके ताकि सर्जरी से इसे निकालना आसान हो। रेक्टल (मलाशय) कैंसर जो शरीर के अन्य भागों में बढ़ गया है और सर्जरी से निकाला नहीं जा सकता है उसके लक्षणों के इलाज के लिए भी कीमोथेरेपी का उपयोग किया जा सकता है ।
रेक्टल (मलाशय) कैंसर के कुछ मामलों में इम्यूनोथेरेपी की सलाह दी जाती है। इम्यूनोथेरेपी एक कैंसर उपचार पद्धति है जो मरीज़ की अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली को रोग से लड़ने के लिए उत्तेजित करती है। इम्यूनोथेरेपी के दौरान, शरीर की प्राकृतिक सुरक्षा को कैंसर के खिलाफ लडने, मजबूत करने और पुनर्स्थापित करने के लिए या तो शरीर द्वारा निर्मित या प्रयोगशाला में संश्लेषित किए गए विशेष दवाओं का उपयोग किया जाता है।
टार्गेटेड थेरेपी (लक्षित चिकित्सा) एक प्रकार का उपचार है जो कैंसर सेल्स (कोशिकाओं) पर मौजूद विशिष्ट कमजोरियों की पहचान करता है और विशेष दवा के माध्यम से उन पर हमला करता है। टार्गेटेड थेरेपी (लक्षित चिकित्सा) सटीक उपचार का एक प्रकार है क्योंकि यह सामान्य रूप से कार्य करने वाली सेल्स (कोशिकाओं) को बिना नुकसान पहुंचाए कैंसर सेल्स (कोशिकाओं) को सटीक रूप से लक्षित करती है।
हां, रेक्टल (मलाशय) कैंसर का इलाज किया जा सकता है। यदि प्रारंभिक चरणों में इसका पता चल जाता है, तो इस कैंसर का उत्कृष्ट नैदानिक परिणामों के साथ इलाज किया जा सकता है और जीवन की गुणवत्ता भी बहुत अधिक प्रभावित नहीं होती है।
किसी भी अन्य प्रकार के कैंसर की तरह, रेक्टल (मलाशय) कैंसर के लिए प्रारंभिक चरणों में पता लगाना महत्वपूर्ण है। यदि आपको लगता है की आपको रेक्टल (मलाशय) कैंसर होने का जोखिम अधिक हैं, तो आप रेक्टल (मलाशय) कैंसर के लिए नियमित जांच पर विचार कर सकते हैं, जो रोग की रोकथाम और जल्दी पता लगाने में मदद कर सकता है।
ज्यादातर मामलों में, रेक्टल (मलाशय) कैंसर, एडिनोमेटस पॉलीप सौम्य सेल्स (कोशिकाओं) के समूह के रूप में शुरू होता है। इनमें से अधिकांश पॉलीप्स नॉन -कैंसरस होते हैं, हालांकि, 10-15 साल के बाद इनमें से कुछ कैंसरस हो सकते हैं।
जब कैंसर रेक्टम (मलाशय) में विकसित होता है, तो इसके बढ़ने और फैलने की दर इसके ग्रेड और मरीज़ की कुल स्वास्थ्य स्थिति, जीवन शैली की आदतों आदि जैसे अन्य कारकों पर निर्भर करती है।
हर एक मरीज़ द्वारा अनुभव किए जाने वाले दुष्प्रभाव दिए गए उपचार पर निर्भर करते हैं। सर्जरी से रक्तस्राव और जहां चीरा लगाया गया था उस जगह पर दर्द, थकान, बीमारी की भावना, सूजन, चोट लगना आदि जैसे दुष्प्रभाव हो सकते हैं ।
कीमोथैरेपी से बालों का झड़ना, मुंह में छाले, मतली और उल्टी, पतले दस्त, चेता को हानि, थकान, संक्रमण आदि हो सकते हैं।
रेडिएशन थेरेपी (विकिरण चिकित्सा) से त्वचा में जलन, भूख न लगना, पतले दस्त आदि, जैसे कुछ दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं।
ज्यादातर मामलों में, मरीज़ों को आंत्र विकारों का अनुभव हो सकता है। आंत्र कार्यों में सुधार होने तक डॉक्टर आपके भोजन की आदतों में कुछ बदलाव करने की सिफारिश कर सकते हैं।
इनमें से अधिकांश दुष्प्रभाव धीरे-धीरे दूर हो जाते हैं। हालांकि, अगर इन दुष्प्रभावों का प्रबंधन करना मुश्किल हो जाता है, तो मरीज मदद के लिए डॉक्टरों के पास जा सकते हैं।
हां, रेक्टल (मलाशय) कैंसर के लिए जांच के तरीके उपलब्ध हैं। ज्यादातर मामलों में, रेक्टल (मलाशय) कैंसर की जांच के लिए कोलोनोस्कोपी की सिफारिश की जाती है।
प्रक्रिया से पहले, मरीज़ को बेहोश किया जाता है। एक कोलोनोस्कोप, जो एक लचीली, प्रकाश स्त्रोत वाली ट्यूब होती है, मरीज़ को बेहोश करने की क्रिया के बाद इस ट्यूब को रेक्टम (मलाशय) में डाला जाता है, और पूरे कोलन (बृहदान्त्र) और रेक्टम (मलाशय) क्षेत्र की पॉलीप्स या कैंसर के लिए जाँच की जाती है।
जिन लोगों का कोलोरेक्टल (मलाशय) कैंसर का पारिवारिक इतिहास है, कोलोरेक्टल (मलाशय) कैंसर का व्यक्तिगत इतिहास है, जिन्हें इन्फ्लामेटोरी बोवेल सिंड्रोम आदि है, ऐसे उच्च जोखिम वाले लोगों के लिए रेक्टल स्क्रीनिंग की दृढ़ता से सिफारिश की जाती है।
यद्यपि आप रेक्टल (मलाशय) कैंसर को पूरी तरह से रोक नहीं सकते हैं, यहाँ कुछ तरीकें बताएं गए हैं जो आप रेक्टल (मलाशय) कैंसर के जोखिम को कम करने के लिए कर सकते हैं :